कम नामांकन वाले स्कूलों को बंद करने से पहले कारण दूर करे सरकार, 30 दिन में आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग
देहरादून, 30 अगस्त 2026। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में करीब 5,000 सरकारी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें करीब 4,275 प्राथमिक और 650 जूनियर हाईस्कूल शामिल हैं। कुछ विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या महज एक, तीन या चार रह गई है।
यशपाल आर्य ने कहा कि करीब 12 हजार करोड़ रुपये के वार्षिक शिक्षा बजट के बावजूद सरकारी स्कूलों में कम होता नामांकन गंभीर चिंता का विषय है। सरकार को बताना चाहिए कि स्कूलों में बच्चों की संख्या क्यों घट रही है और शिक्षकों, भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली तथा डिजिटल सुविधाओं की क्या स्थिति है।
30 दिन में आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग
नेता प्रतिपक्ष ने सरकार से प्रत्येक सरकारी विद्यालय की छात्र संख्या, 10 या उससे कम छात्र संख्या वाले स्कूलों, पिछले पांच वर्षों में बंद या विलय किए गए विद्यालयों और स्वीकृत व कार्यरत शिक्षकों का विवरण 30 दिनों के भीतर सार्वजनिक करने की मांग की। साथ ही जर्जर भवनों, मूलभूत सुविधाओं की कमी और नामांकन बढ़ाने के लिए खर्च की गई राशि का भी ब्यौरा मांगा।
स्कूल बंद नहीं, पुनर्जीवन की नीति बनाए सरकार
आर्य ने कहा कि कम नामांकन वाले विद्यालयों को बंद करना समस्या का समाधान नहीं है। सरकार को पहले पर्याप्त शिक्षक, बेहतर आधारभूत सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराकर स्कूलों का पुनर्जीवन करना चाहिए। उन्होंने प्रत्येक कम नामांकन वाले विद्यालय के लिए विशेष पुनर्जीवन पैकेज और योजनाओं का स्वतंत्र मूल्यांकन कराने की मांग की।
उन्होंने कहा कि विशेषकर पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी स्कूल गांव के सामाजिक अस्तित्व का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। किसी भी स्कूल को बंद या विलय करने से पहले ग्रामसभा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की राय लेना जरूरी है।
यशपाल आर्य ने कहा कि जनता के पैसे से चलने वाले विद्यालय जनता के बच्चों के लिए हैं। सरकार की जिम्मेदारी बच्चों को स्कूल तक पहुंचाना है, न कि बच्चों की संख्या घटने के बाद स्कूलों को ही खत्म कर देना।
