देहरादून 29 अगस्त 2026।
“एक दिन नई सुबह उठेगी यहाँ, देखना…”
उत्तराखंड की धरती ने जिस राज्य आंदोलन को देखा, वह केवल एक नए राज्य की मांग का आंदोलन नहीं था। यह पहाड़ के अस्तित्व, अस्मिता, संसाधनों, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन की आकांक्षाओं का आंदोलन था। यह उस सपने का आंदोलन था, जिसमें गांव आबाद रहें, नौजवानों को अपने घर-गांव में रोजगार मिले, नदियों का पानी स्थानीय लोगों के काम आए और पहाड़ की पहचान तथा संस्कृति सुरक्षित रहे।
इन्हीं सवालों और सपनों को फिर से केंद्र में लाने का प्रयास उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी मंच द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय राज्य आंदोलनकारी सम्मेलन में किया जा रहा है। 30 और 31 अगस्त 2026 को नगर निगम सभागार में आयोजित इस सम्मेलन में प्रदेशभर से राज्य आंदोलनकारी जुटेंगे। चार अलग-अलग सत्रों में विशेषज्ञों, आंदोलनकारियों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों के साथ राज्य के वर्तमान और भविष्य पर विचार-मंथन होगा।
यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने के बाद उत्तराखंड को केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने के बजाय यह भी देखना होगा कि आंदोलन के मूल सवालों में से कितने सवाल हल हुए और कितने आज भी हमारे सामने खड़े हैं।
मुझे इस अवसर पर अपना लिखा वह जनगीत याद आता है, जो उत्तराखंड आंदोलन के दौरान रैलियों, मशाल जुलूसों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में खूब गूंजा था—
“लड़के लेंगे, भिड़ के लेंगे,
छीन के लेंगे उत्तराखंड।”
इस गीत में उत्तराखंड की तत्कालीन आकांक्षाओं को पांच ‘प’ के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया था—पानी, पलायन, पर्यावरण, पर्यटन और पहचान।
ये केवल शब्द नहीं थे। ये उस समय के उत्तराखंड के सबसे बड़े सवाल थे और आज भी किसी न किसी रूप में हमारे सामने मौजूद हैं।
गीत की एक पंक्ति थी—
“विकास की कहानी गांव से है दूर-दूर क्यों,
नदी पास है मगर ये पानी दूर-दूर क्यों?”
आज जब हम उत्तराखंड के विकास की चर्चा करते हैं तो यह पंक्ति फिर याद आती है। हमारे पास नदियां हैं, जलस्रोत हैं, जंगल हैं, पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इन संसाधनों का लाभ अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा, यह सवाल आज भी प्रासंगिक है।
इसी तरह एक और पंक्ति थी—
“नौजवान खेत और गांव से बिछड़ रहा,
नौकरी की खोज में पहाड़ से उतर रहा।”
पलायन पर वर्षों से योजनाएं बन रही हैं। रोजगार और स्वरोजगार के लिए अनेक योजनाएं भी संचालित हो रही हैं। सड़कों, बिजली, संचार और शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी काम हुआ है। लेकिन इसके बावजूद यदि गांवों की आबादी लगातार चिंता का विषय बनी हुई है तो हमें यह समझना होगा कि विकास की गति के साथ उसकी दिशा पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
यह स्वीकार करना होगा कि राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में बहुत काम हुआ है। परिस्थितियां बदली हैं, बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है और विकास के अनेक नए रास्ते खुले हैं। लेकिन काम की उपलब्धियों के साथ उन क्षेत्रों को भी चिन्हित करना होगा जहां अपेक्षित परिणाम अभी नहीं मिल पाए हैं।
यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की ताकत है कि वह उपलब्धियों का सम्मान करते हुए अधूरे कामों पर सवाल भी पूछे।
राज्य आंदोलनकारी मंच लगातार ऐसे सवालों को उठाता रहा है। यह भी महत्वपूर्ण है कि मंच केवल विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि सरकार और व्यवस्था के प्रयासों को भी रेखांकित करे तथा समाधान की दिशा में संवाद कायम करे। यही किसी आंदोलन की सकारात्मक भूमिका हो सकती है।
राज्य आंदोलन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं है। वह उत्तराखंड की सामूहिक चेतना का हिस्सा है। इस आंदोलन में हजारों लोगों ने अपना योगदान दिया। छात्र, युवा, कर्मचारी, पूर्व सैनिक, महिलाएं, किसान, पत्रकार, संस्कृतिकर्मी और समाज के विभिन्न वर्गों ने इसमें भागीदारी की।
इस यात्रा में अनेक चेहरे और अनेक आवाजें आज भी स्मृतियों में जीवित हैं। भाई रविंद्र जुगरान की आंदोलनकारी चेतना, बड़े भाई विवेकानंद खंडूड़ी का अनुभव, वेद उनियाल की वैचारिकता, रणजीत सिंह वर्मा का नेतृत्व और सुशीला बलूनी जी की प्रखरता—इनके साथ ही अनगिनत आंदोलनकारियों का योगदान उत्तराखंड की राज्य निर्माण यात्रा का अभिन्न हिस्सा है।
आंदोलन के शहीदों का बलिदान और मातृशक्ति के साथ हुआ जघन्य अनाचार उस दौर की ऐसी पीड़ादायक स्मृतियां हैं, जिन्हें समय कभी मिटा नहीं सकता।
उस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में संस्कृति और पत्रकारिता की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। देहरादून का सांस्कृतिक मोर्चा, उत्तरकाशी के कला दर्पण की सौ दिनों तक चली प्रभात फेरियां, नैनीताल समाचार का समाचार बुलेटिन और अनेक स्थानीय पत्रकारों एवं सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जनकवि गिर्दा, बल्ली सिंह चीमा और जाहूर आलम जैसे रचनाकारों के जनगीतों ने आंदोलन की आवाज को शब्द और स्वर दिया। इन गीतों में केवल आक्रोश नहीं था, बल्कि एक बेहतर उत्तराखंड का सपना भी था।
आज जब राज्य आंदोलनकारी सम्मेलन होने जा रहा है तो जरूरत इस बात की है कि हम अतीत को केवल स्मरण न करें, बल्कि उससे भविष्य की दिशा भी तय करें।
क्या हमारे गांवों में रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा हुए हैं? क्या पहाड़ की युवा पीढ़ी को अपने ही क्षेत्र में बेहतर भविष्य दिखाई दे रहा है? क्या हमारे जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय लोगों की भागीदारी और अधिकार सुनिश्चित हो रहे हैं? क्या विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम हो पा रहा है? क्या उत्तराखंड की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान मजबूत हो रही है?
इन सवालों पर गंभीर विमर्श होना चाहिए।
राज्य आंदोलनकारियों की अगली भूमिका भी यहीं से तय हो सकती है। आंदोलन की ऊर्जा को नई पीढ़ी के सवालों से जोड़ना होगा। उत्तराखंड को केवल पलायन रोकने की घोषणाओं से नहीं, बल्कि गांवों में ऐसे अवसर पैदा करके मजबूत करना होगा, जिनसे युवा स्वेच्छा से अपने गांव में रहना पसंद करे।
इस सम्मेलन के लिए राज्य आंदोलनकारी मंच के अध्यक्ष जगमोहन सिंह नेगी, उनके पदाधिकारियों और सदस्यों का प्रयास सराहनीय है। सम्मेलन में विशेषज्ञों का मंथन और व्यवस्था के साथ संवाद निश्चित रूप से नए विचारों को जन्म दे सकता है।
मुझे इस सम्मेलन का निमंत्रण रामलाल खंडूड़ी ने दिया तथा जगमोहन सिंह नेगी, प्रदीप कुकरेती सहित अनेक साथियों ने संपर्क किया। उन्हें मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद।
उत्तराखंड आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसका सामूहिक सपना था। वह सपना केवल राज्य बनाने तक सीमित नहीं था। असली सपना था—ऐसा उत्तराखंड बनाना, जहां पहाड़ का युवा अपने भविष्य के लिए पहाड़ छोड़ने को मजबूर न हो, जहां गांव विकास की मुख्यधारा से जुड़े हों और जहां राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ राज्य की जनता को मिले।
25 वर्ष बाद यह सवाल फिर हमारे सामने है कि हमने उस सपने की कितनी दूरी तय की है।
शायद इसी सवाल का जवाब तलाशना इस सम्मेलन की सबसे बड़ी सार्थकता होगी।
और अंत में उसी जनगीत की पंक्तियां आज भी उम्मीद जगाती हैं—
“नई कहानी तिरंगे के साथ बुनी जाएगी,
हंसुली और दरातियों की बात सुनी जाएगी।”
क्योंकि उत्तराखंड की नई कहानी तभी पूरी होगी, जब इसमें उसके गांव, खेत, जंगल, नदियां, युवा, मातृशक्ति और यहां की लोक संस्कृति की आवाज भी पूरी मजबूती से सुनी जाएगी।
नई सुबह की प्रतीक्षा अभी खत्म नहीं हुई है।

